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Thalassemia (थैलेसीमिया) Patient Information article in Hindi (हिंदी)

Illustration showing malformed red blood cells in thalassemia. Thalassemia is an inherited blood disorder that causes the body to have less haemoglobin.

थेलेसीमिया बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाला रक्त-रोग है। इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है जिसके कारण रक्तक्षीणता/खून की कमी/”एनीमिया” के लक्षण प्रकट होते हैं।

थैलेसीमिया को इसकी गंभीरता के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

यदि पैदा होने वाले बच्चे के माता-पिता दोनों के जींस में माइनर थेलेसीमिया होता है, तो बच्चे में मेजर थेलेसीमिया हो सकता है, जो काफी घातक हो सकता है। इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है। इसमें रोगी बच्चे के शरीर में खून की भारी कमी होने लगती है, जिसके कारण उसे बार-बार बाहर से खून की आवश्यकता पड़ती है। यदि माता-पिता दोनों को माइनर रोग है तब भी बच्चे को यह रोग होने के 25 प्रतिशत संभावना है।किन्तु माता-पिता में से एक ही में माइनर थेलेसीमिया होने पर किसी बच्चे को मेजर थेलेसीमिया का खतरा नहीं होता।अतः यह अत्यावश्यक है कि विवाह से पहले महिला-पुरुष दोनों अपनी जाँच करा लें।

थैलेसीमिया प्रभावित ग्लोबिन के प्रकार के आधार पर 2 प्रकार का होता है:-

हीमोग्लोबिन, ग्लोबीन चेन के दो जोड़ों का बना होता है। आमतौर पर, वयस्कों में एक जोड़ा अल्फ़ा चेन और एक जोड़ा बीटा चेन होती है। कभी-कभी इनमें से कोई एक चेन या एक से ज़्यादा चेन असामान्य होती है। यह दो मुख्य प्रकार का होता है

अल्फ़ा-थैलेसीमिया, अफ़्रीकी या अश्वेत अमेरिकी, भूमध्यसागरीय या दक्षिण-पूर्वी एशियाई वंश के लोगों में सबसे ज़्यादा पाया जाता है।

बीटा-थैलेसीमिया, भूमध्यसागरीय, मध्य-पूर्वी, दक्षिण-पूर्वी एशियाई या भारतीय वंश के लोगों में सबसे ज़्यादा पाया जाता है।

थैलेसीमिया के लक्षण

सभी प्रकार के थैलेसीमिया के लक्षण एक जैसे होते हैं, लेकिन इनकी गंभीरता अलग-अलग होती है।

अल्फ़ा-थैलेसीमिया माइनर और बीटा थैलेसीमिया माइनर में लोगों को हल्का एनीमिया होता है और कोई लक्षण नहीं दिखते।

अल्फ़ा-थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित लोगों में एनीमिया के मध्यम या गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं, जैसे, थकान, सांस लेने में तकलीफ़ होना, त्वचा का पीला पड़ना और स्प्लीन का बढ़ना जिससे उनका पेट फूला रहता है और बेचैनी महसूस होती है।

बीटा-थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित लोगों में एनीमिया के गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं, जैसे थकान, कमज़ोरी, सांस लेने में तकलीफ़ होना और उन्हें पीलिया भी हो सकता है, जिसमें उनकी त्वचा और आँखों का सफ़ेद हिस्सा पीला पड़ जाता है, त्वचा में अल्सर हो सकते हैं और गॉल ब्लैडर में पथरी हो सकती है। ऐसे मरीज़ों का स्प्लीन भी बढ़ सकता है। बोन मैरो के ज़्यादा सक्रिय होने के कारण हड्डियाँ (खासतौर पर चेहरे और सिर की हड्डी) मोटी और बड़ी हो सकती हैं। हाथ और पैरों की लंबी हड्डियाँ कमज़ोर हो सकती है और आसानी से टूट सकती हैं।

बीटा-थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों का शारीरिक विकास धीरे होता है और उनकी किशोरावस्था, सामान्य बच्चों की अपेक्षा देर से आती है। चूंकि इसमें आयरन का अवशोषण बढ़ सकता है और बार-बार ब्लड ट्रांसफ़्यूजन (और भी ज़्यादा आयरन देना) करने की ज़रूरत पड़ सकती है, इसलिए आयरन ज़्यादा इकट्ठा होकर हृदय की मांसपेशियों में जमा हो सकता है जिससे थोड़े समय बाद आयरन की मात्रा ज़्यादा होने की बीमारी हो सकती है, दिल का दौरा पड़ सकता है, यहां तक कि समय से पहले मौत भी हो सकती है।

थैलेसीमिया का पता कैसे लगाया जाता है

  • रक्त की जाँच – कंप्लीट ब्लड काउंट जिसे सीबीसी भी बोलते हैं

  • हीमोग्लोबिन इलैक्ट्रोफ़ोरेसिस/एचपीएलसी

  • बच्चे के जन्म से पहले की जाने वाली जांच

  • आनुवंशिक परीक्षण – आनुवंशिक पैटर्न का पता लगाया जाता है।

थैलेसीमिया का इलाज

  • इसके इलाज के लिए कभी-कभी ब्लड ट्रांसफ़्यूजन किया जाता है, स्प्लीन को निकाला जाता है या आयरन कीलेशन थेरेपी दी जाती है

  • स्टेम सैल ट्रांसप्लांटेशन

जिन लोगों में थैलेसीमिया के हल्के लक्षण होते हैं उन्हें इलाज की ज़रूरत नहीं होती।

जिन लोगों को अधिक गंभीर थैलेसीमिया है, उन्हें स्प्लीन (स्प्लेनेक्टॉमी) निकालने, ब्लड ट्रांसफ़्यूजन करने, या आयरन केलेशन थेरेपी करने की आवश्यकता हो सकती है।

कीलेशन थेरेपी में रक्त से आयरन की अतिरिक्त मात्रा निकाल दी जाती है। इसमें आयरन कीलेटर कही जाने वाली दवाएँ, खाने के लिए (डेफ़रसिरॉक्स या डेफ़रिप्रोन) दी जा सकती हैं अथवा त्वचा के माध्यम (सबक्यूटेनियस) से इन्फ़्यूजन (डेफ़रॉक्सिमीन) किया जा सकता है अथवा शिरा में (इंट्रावीनस) दिया जा सकता है।

बीटा-थैलेसीमिया से पीड़ित लोगों को ब्लड ट्रांसफ़्यूजन से बचाने के लिए लसपेटरसेप्ट दी जा सकती है।

गंभीर थैलेसीमिया से पीड़ित कुछ लोगों में स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन/ अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण करना पड़ सकता है।

यह लेख डॉ. सुजीत कुमार द्वारा लिखा गया है

डॉ. सुजीत कुमार
  • हेमटोलॉजिकल समस्याओं वाले मरीजों के इलाज में 7+ वर्षों का अनुभव।
  • एसजीपीजीआई लखनऊ से डीएम क्लिनिकल हेमेटोलॉजी.
  • यूरोपियन हेमेटोलॉजी एसोसिएशन सर्टिफाइड (2019) क्लिनिकल हेमेटोलॉजिस्ट।
  • टाटा मेमोरियल अस्पताल, वाराणसी में पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर (वयस्क रुधिर विज्ञान और अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण – होमी भाभा कैंसर अस्पताल) 2021-2024
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